Thursday, December 5, 2019

बे-साबता

ये बे-साबता सी ज़िंदगी,
ढूंढती फिरती है कुछ
कुछ जो इसे मायने दे, दायरे दे
इक दिशा, कोई मंज़िल, इक हमसफर
इक पड़ाव, इक रस्ता, शायद कुछ पल सुकून के
ढूंढती फिरती है कुछ
ये बे-साबता सी ज़िंदगी...

कुछ अशार तहे-दिल से,
उनको समझते कुछ पोशीदा चेहरे,
वो कश्मकश कहीं पहुँचने की,
वो बेबस नज़रों से दुनिया को गुज़रते देखने का अज़ाब,
और कहीं पीछे छूट जाने के खौफ के बीच
ढूंढती फिरती है कुछ
ये बे-साबता सी ज़िंदगी...

वो पशेमां रातों की कसमसाहट,
वो खुद को खोने का डर ,
टूटता हौसला और ऊँगलियों के बीच से फिसलती ज़िंदगी,
बरबस ही भर आयी नज़रों के पार से धुंधलाती वो रौशनी,
इक कवायद फिर खड़े होने की,
और इक फौरी मुस्कुराहट के साथ
ढूंढती फिरती है कुछ
ये बे-साबता सी ज़िंदगी...

Friday, February 8, 2019

बेपरवाह

एक मुद्दत हुई है यूँ बेपरवाह हुए हुए,
यूँ ही बैठे रहे हों बेख्याल बेफिक्र से
दे दिये हों पंख अपनी सोच को परवाज़ के लिए,
और एक आसमान बेहद, बेलौस और बेइंतहा