एक मुद्दत हुई है यूँ बेपरवाह हुए हुए, यूँ ही बैठे रहे हों बेख्याल बेफिक्र से दे दिये हों पंख अपनी सोच को परवाज़ के लिए, और एक आसमान बेहद, बेलौस और बेइंतहा
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