जब भी हमने हँसना चाहा तूने आँखों में आंसू ला दिए,
हमने खुशियों को पाना चाहा तूने ग़म ही मिला दिए,
हमने ग़म में ही खुशी पायी और आँसुओं में मुस्कुरा दिए,
तू ही बता ऐ ज़िन्दगी ये तेरी हार है या जीत???
हम भी ज़िंदादिल थे हम भी खिलखिलाते थे कभी,
हम भी तेरी चाहत के ख्वाब सजाते थे कभी,
उन ख्वाबों में तूने बेबसी के फूल खिला दिए,
तू ही बता ऐ ज़िन्दगी ये तेरी हार है या जीत???
जिस दिल में हमने तेरे लिए फूल सजा रखे थे,
पलकों में प्यार के आशियाने बना रखे थे,
उस ज़हन में तूने मौत के अरमाँ जगा दिए,
तू ही बता ऐ ज़िन्दगी ये तेरी हार है या जीत???
ऐसी जीत का क्या मतलब जिसमें कोई खुशी न हो,
जीते हों हम ऐसे मानों पास अपने ज़िन्दगी न हो,
ऐसी ज़िन्दगी को छोड़ हम मौत के दामन में समा गए,
तू ही बता ऐ ज़िन्दगी ये तेरी हार है या जीत???
Friday, September 4, 2009
माज़ी...
लगता है मानों कल ही की बात हो,
जब हम और तुम साथ साथ थे
ये दुनिया लगती थी कितनी हसीं,
न फिक्र न ही ग़म का निशाँ था कहीं,
खुशियों से भरा था हमारा दामन,
आज सूना पड़ा है मेरा आँगन,
तेरी यादों के कुछ फूल रह गए हैं बाकी,
उन्हें ले तेरे दर पे आ गए हम साकी,
ला पिला दे आज अपनी आखों से,
कुछ फूल खिल उठें उन खाकों से,
जिस खाक में मिल गए सपने मेरे सुनहरे,
टूट गए वो रिश्ते जो लगते थे कभी गहरे,
बेगाने हो गए वो लोग सभी,
जो अपने हुआ करते थे कभी,
वो सब चले गए रह गया मैं अकेला,
फिर भी कभी जब आता है यादों का मेला,
लगता है मानों कल ही की बात हो,
जब हम और तुम साथ साथ थे...
जब हम और तुम साथ साथ थे
ये दुनिया लगती थी कितनी हसीं,
न फिक्र न ही ग़म का निशाँ था कहीं,
खुशियों से भरा था हमारा दामन,
आज सूना पड़ा है मेरा आँगन,
तेरी यादों के कुछ फूल रह गए हैं बाकी,
उन्हें ले तेरे दर पे आ गए हम साकी,
ला पिला दे आज अपनी आखों से,
कुछ फूल खिल उठें उन खाकों से,
जिस खाक में मिल गए सपने मेरे सुनहरे,
टूट गए वो रिश्ते जो लगते थे कभी गहरे,
बेगाने हो गए वो लोग सभी,
जो अपने हुआ करते थे कभी,
वो सब चले गए रह गया मैं अकेला,
फिर भी कभी जब आता है यादों का मेला,
लगता है मानों कल ही की बात हो,
जब हम और तुम साथ साथ थे...
ज़िंदगी
ज़िन्दगी इस कदर तनहा तो न थी की तेरा ख्याल आता,
मौत भी बेवफा न थी जो ज़िन्दगी का सवाल आता...
अपनी सूनी महफिलों को तेरी यादों से रौशन करते रहे हम,
जिन राहों ने ठुकराया उन्हीं पर चलते रहे हम,
हम यूँ तो न थे की तेरी खुशियों को देख कर मलाल आता,
मौत भी बेवफा न थी जो ज़िन्दगी का सवाल आता...
ऐ इश्क, हमने भी तुम्हें कभी अपनाया था,
हमारी ज़िन्दगी में भी कभी मुहब्बत का हसीं साया था,
पर किस्मत को गवारा न था कीहमारी चाहत पर जलाल आता,
मौत भी बेवफा न थी जो ज़िन्दगी का सवाल आता...
प्यार...
सुना है इस जहाँ में प्यार से प्यारी कोई चीज़ नहीं,
फिर क्यों यहाँ प्यार करना एक गुनाह है?
जो चीज़ सुनने में इतनी खूबसूरत लगती है
क्यों उसे अपनाने वालों के होठों पर एक आह है?
माना ये ज़िन्दगी दुष्वारियों का सफर है
फूलों कि नहीं काटों कि रहगुज़र है
क्या इस पर चलने वालों को नहीं खूबसूरती कि चाह है?
फिर क्यों यहाँ प्यार करना एक गुनाह है???
ज़िन्दगी के कुछ मोड़ पर मिलती हैं तन्हाईयाँ भी,
होती हैं इस सफर में कई बार रुस्वाइयां भी,
क्या तन्हाईयों में होती नहीं एक साथी कि चाह है?
फिर क्यों यहाँ प्यार करना एक गुनाह है???
क्या आदमी का ख़ुद कि ज़िन्दगी पर कोई इख्तियार नहीं?
क्या इस दुनिया की रिवायतों से हर दिल बेजार नहीं?
क्या ये जहाँ कभी करता इस पाक जज्बे कि परवाह है?
फिर क्यों यहाँ प्यार करना एक गुनाह है???
फिर क्यों यहाँ प्यार करना एक गुनाह है?
जो चीज़ सुनने में इतनी खूबसूरत लगती है
क्यों उसे अपनाने वालों के होठों पर एक आह है?
माना ये ज़िन्दगी दुष्वारियों का सफर है
फूलों कि नहीं काटों कि रहगुज़र है
क्या इस पर चलने वालों को नहीं खूबसूरती कि चाह है?
फिर क्यों यहाँ प्यार करना एक गुनाह है???
ज़िन्दगी के कुछ मोड़ पर मिलती हैं तन्हाईयाँ भी,
होती हैं इस सफर में कई बार रुस्वाइयां भी,
क्या तन्हाईयों में होती नहीं एक साथी कि चाह है?
फिर क्यों यहाँ प्यार करना एक गुनाह है???
क्या आदमी का ख़ुद कि ज़िन्दगी पर कोई इख्तियार नहीं?
क्या इस दुनिया की रिवायतों से हर दिल बेजार नहीं?
क्या ये जहाँ कभी करता इस पाक जज्बे कि परवाह है?
फिर क्यों यहाँ प्यार करना एक गुनाह है???
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