वो ज़िंदगी,
हँसती-हँसाती, कहकहे लगाती,
खिलखिलाती खुशियाँ फ़ैलाती
मुस्कुराती उत्सव मनाती,
इन ऊँची-नीची राहों पर
कभी लड़खड़ाती, कभी डगमगाती,
जो पास थी आज कहीं दूर हो गयी है
वो ज़िंदगी...
वो ज़िंदगी,
इक साया था, इक हाथ था
इक हमसफर जो साथ था,
कहीं बेटा था, कहीं बाप था,
हर धूप से घर को ढांपता,
इक पेड़ था, अपनी छाया जो अब समेट गया,
वो ज़िंदगी...
वो ज़िंदगी
कभी सुबह थी, कभी शाम थी
कभी बारिश, कभी घाम थी,
कभी ख्वाहिशें तमाम थी,
हर सफर का इक मुकाम थी,
मौसमों का रंग था जो अब सारी फिज़ा में बिखर गया,
वो ज़िंदगी...
वो ज़िंदगी
वो प्यार था, तकरार था
इनकार था, इज़हार था
उन्माद था, ख़ुमार था
इक गोद थी सुंकूँ भरी,
इस वक्त की लहरों में जो बिछड़ गयी
वो ज़िंदगी...

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