Friday, September 4, 2009

माज़ी...

लगता है मानों कल ही की बात हो,
जब हम और तुम साथ साथ थे
ये दुनिया लगती थी कितनी हसीं,
न फिक्र न ही ग़म का निशाँ था कहीं,
खुशियों से भरा था हमारा दामन,
आज सूना पड़ा है मेरा आँगन,
तेरी यादों के कुछ फूल रह गए हैं बाकी,
उन्हें ले तेरे दर पे आ गए हम साकी,
ला पिला दे आज अपनी आखों से,
कुछ फूल खिल उठें उन खाकों से,
जिस खाक में मिल गए सपने मेरे सुनहरे,
टूट गए वो रिश्ते जो लगते थे कभी गहरे,
बेगाने हो गए वो लोग सभी,
जो अपने हुआ करते थे कभी,
वो सब चले गए रह गया मैं अकेला,
फिर भी कभी जब आता है यादों का मेला,
लगता है मानों कल ही की बात हो,
जब हम और तुम साथ साथ थे...

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