Friday, September 4, 2009

प्यार...

सुना है इस जहाँ में प्यार से प्यारी कोई चीज़ नहीं,
फिर क्यों यहाँ प्यार करना एक गुनाह है?
जो चीज़ सुनने में इतनी खूबसूरत लगती है
क्यों उसे अपनाने वालों के होठों पर एक आह है?

माना ये ज़िन्दगी दुष्वारियों का सफर है
फूलों कि नहीं काटों कि रहगुज़र है
क्या इस पर चलने वालों को नहीं खूबसूरती कि चाह है?
फिर क्यों यहाँ प्यार करना एक गुनाह है???

ज़िन्दगी के कुछ मोड़ पर मिलती हैं तन्हाईयाँ भी,
होती हैं इस सफर में कई बार रुस्वाइयां भी,
क्या तन्हाईयों में होती नहीं एक साथी कि चाह है?
फिर क्यों यहाँ प्यार करना एक गुनाह है???

क्या आदमी का ख़ुद कि ज़िन्दगी पर कोई इख्तियार नहीं?
क्या इस दुनिया की रिवायतों से हर दिल बेजार नहीं?
क्या ये जहाँ कभी करता इस पाक जज्बे कि परवाह है?
फिर क्यों यहाँ प्यार करना एक गुनाह है???

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